उजाला - एक कविता। Brightness - A Poem
उजाला
मेहनत करके क्या मिला?
अच्छा बन के क्या मिला?
धोखा! गरीबी! लाचारीयत!
अंधकारसे घिरेहो तुम
आज बेबस हो तुम।
सोचो क्या ऐसे जिल्लत भड़ा जिंदगी चाहते थे?
क्या इसके लिए मेहनत करते थे?
पूछो आज खुद से,
क्या हो तुम?
क्यों हो तुम?
क्या करना चाहते थे,
और क्या बनके रह गए?
ऐसा मत सोचो
की बहुत देर हो गया,
कुछ नहीं और कर पाओगे,
सब कुछ लुट गया!
अभी भी बहुत कुछ कर सकोगे,
बहुत आगे बढ़ सकोगे,
बस हिम्मत नहीं हारना है
मेहनत करते जाना है!
एक दिन जरुर पाओगे अपने आप को,
वह मुकाम पर
बस आज सहले और मेहनत कर।
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