झुकु कैसे - एक कविता।‌How can I Bow - A Poem

 झुकु कैसे 


झुकु कैसे - एक कविता।‌How can I Bow - A Poem


मैं चौंक गया यह पड़के

 की,

 कुछ पानाहै तो झुकना सीखो,

 क्या मतलब है इसका

 कुछ बड़ा पानेके लिए

 आदर्श, उसुल सब भुला दूं!


यह तो हो गया छोटा बात

 छोटा सोच से मुलाकात,

 अगर सब कोई ऐसा सोचता

 तो क्या आज देश आजाद होता!


तो क्या गांधीजी, नेताजी

 चंद्रशेखर आजाद.......

 सब बेवकूफ था?

 जो जान का परवाह किए बिना

 ब्रिटिश से लड़ पड़ा।

 क्या जरूरत था उनका

 देशवासी के भलाई के लिए अपना जान देना।


वह रह सकता था चैनसे

 जिंदगी उनका होता आराम का,

 पर बह अलग सोचा

 आदर्श, उसुल उनका था ऊंचा, 

 इसलिए वह झुक कर खुश रहने से ज्यादा

 शर उठा कर मरना चाहा!


पड़िए अगला कविता (वदलो)
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झुकु कैसे - एक कविता।‌How can I Bow - A Poem


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